
तस्वीरों की दुखती रग पर
जब आज हथौड़े चलते है
काली स्याही में डूबे
जब उजले बगुले उड़ते है
हाथों में तीर कमान लिए
फिर भी मैं बुत सा जिंदा हूँ
अपनी आज़ादी पर शर्मिंदा हूँ...
डूबते उठते मझधारो में हम
अब अपने भी साथ नहीं देते
उम्मीदों के तिनके भी
अब कही अवतार नहीं लेते
किनारे भी भंवर बनकर
हमें डुबोने को आतुर है
हाथों में अमर पतवार लिए
फिर भी मैं बुत सा जिंदा हूँ
अपनी आज़ादी परशर्मिंदा हूँ...
भूखों नगों का देश है ये
युवा ही यहाँ की बूढी है
कानो में डाल कपड़े कपास के
अपनों का ही खून ये पीती है
जाती बड़ी यहाँ मानवता से
खून यहाँ पानी से भी सस्ता है
हाथों में अलख मशाल लिए
फिर भी मैं बुत सा जिन्दा हूँ
अपनी आज़ादी पर शर्मिंदा हूँ...
लुटते थे हमें परदेशी भी
तब दिल पर चोट नहीं लगती थी
जिस्म पर पड़े घाव तो
बिन मलहम के भी भरती थी
ठगे जाते अब अपनों से ही हम
दिल के रोज हजारों टुकड़े होते है
बदलेगी ये तस्वीर कब
कुछ उम्मीद बचाए जिंदा हूँ
अपनी आज़ादी पर शर्मिंदा हूँ....

4 comments:
bahut khoob!!
achha laga padhkar...
@ vivek
thank u vivek, aapki virasat ko sambhalne wala koi hona chahiye na kgp me :)
aapki itni unchai tak to nahi pahunch paunga, lekin koshish karta hoon :)
Bahut sahi Miyan, Bahut hi badhiya......
bahut jyada maarak shakti waali panktiyan hain ye.....
"fir bhi main but sa zinda hoon
apni aazadi par sharminda hoon"
Bahut prabhavi hain..... Elocution mein chhane ki taakat hai inme....
maaf kijiyega maine aapko pehchana nahi.
lekin bahut bahut dhanybad 4 appreciation
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